थोड़ी कम मीठी है 'बरेली की बर्फी' फिर भी परिवार के साथ एक बार तो देखना बनता है

थोड़ी कम मीठी है बरेली की बर्फी फिर भी परिवार के साथ एक बार तो देखना बनता है

'बरेली की बर्फी' की कहानी बरेली की एक लड़की बिट्टी मिश्रा (कृति सैनन) की कहानी है, जो बिंदास जीती है। वह सिगरेट पीती है, बिजली विभाग में नौकरी करती है, ब्रेक डांस करती है और जिन्दगी को खुल कर जीना चाहती है। अपनी सीमाओं में वह बिंदास होकर जीती भी है। उसके पिता नरोत्तम मिश्रा (पंकज त्रिपाठी) को कोई आपत्ति नहीं है। वह बिट्टी से बेटे की तरह व्यवहार करते हैं। हालांकि मधुरभाषी मिश्रा जी के मन में कहीं न कहीं यह बात भी रहती है कि उन्हें इसी समाज के साथ जीना है, इसलिए वे खुल कर उसकी अवहेलना नहीं कर सकते। बिट्टी की मां सुशीला (सीमा पाहवा) एक स्कूल में शिक्षक हैं और उन्हें बिट्टी की ये हरकतें बहुत पसंद नहीं आतीं। मां उसकी शादी के लिए परेशान हैं, पर कोई बिट्टी को कोई पसंद नहीं करता। वह दो बार लड़कों द्वारा रिजेक्ट कर दी जाती है। उसकी मां को लगता है कि बिट्टी की आदतों की वजह से लड़के वाले उसे पसंद नहीं करते। इन सब बातों से दुखी होकर एक दिन बिट्टी घर से भाग जाती है।

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रेलवे स्टेशन पर टाइम पास करने के लिए वह एक किताब खरीदती है 'बरेली की बर्फी'। इस किताब को पढ़ने के बाद उसकी सोच बदल जाती है और वह घर लौट जाती है। इस किताब के लेखक हैं प्रीतम विद्रोही (राजकुमार राव), जिससे बिट्टी बहुत प्रभावित हो जाती है और उनसे मिलने को बेकरार हो जाती है। इस काम में बिट्टी की मदद करता है चिराग दुबे (आयुष्मान खुराना)। चिराग भी बरेली का रहने वाला है और प्यार में एक बार उसका दिल टूट चुका है। बिट्टी से मिलने के बाद वह अपने टूटे दिल को जोड़ने की कोशिश में लग जाता है।


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फिल्म के एक सीन में बिट्टी अपने पापा से कहती है कि बेटा होता तो लोग कहते क्या हुआ जो सिगरेट पीता है. क्या हुआ एक दो बार इंगेजमेंट होते-होते रह गई लेकिन उस पर सवाल इसलिए उठते हैं कि क्योंकि वो एक लड़की है. इस सीन में कृति इतनी भावहीन दिखती हैं कि इतना गंभीर विषय पर भी दर्शक के अंदर कोई भाव नहीं जगा पाता.

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ये एक रोमांटिक कॉमेडी फिल्म है तो कहीं-कहीं हंसाती भी है. इस फिल्म में कुछ ऐसे डायलॉग भी हैं जो आप पहली बार सुन रहे होंगे. जैसे- 'ये तो आस्तीन का एनाकोंडा निकला…', 'डिप्रेस करने भेजा था तुम इंप्रेस करके आ गए हो..'. 'चिराग के पिता ने सोचा था कि लड़का बड़ा होकर नोट छापेगा…. वो छापता तो पर पैसे नहीं, पैंपलेट्स.' इत्यादि. इस फिल्म की सबसे अच्छी बात ये है कि इसे ज्यादा खींचा नहीं गया है. 'बरेली की बर्फी' में चीनी कम है लेकिन फैमिली के साथ एक बार देखी जा सकती है.

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